Bhagat Singh Sukhdev Rajguru Hanged : फांसी का फंदा देख भी नहीं घबराए भगत सिंह अंग्रेज अधिकारी से कहा आप भाग्यशाली हैं
अंतिम क्षणों तक लगाए इंकलाब जिंदाबाद के नारे, निर्धारित समय से 11 घंटे पहले ही दे दी थी फांसी
Bhagat Singh Sukhdev Rajguru Hanged : 23 मार्च, यह दिन भारतीय इतिहास में हमेशा के लिए स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया है। क्योंकि यह दिन ऐसे क्रांतिकारियों के जीवन के अंतिम पलों से जुड़ा है, जिन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा दी। साथ ही अंग्रेजी हुकूमत को बता दिया कि भारतीय वीरों में अपने देश की आजादी के लिए जज्बा किस स्तर तक था।
क्योंकि जब भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव सीढ़ियां चढ़ रहे थे, भगत सिंह ने यहां मौजूद अंग्रेजी मजिस्ट्रेट को कह दिया था कि मिस्टर मजिस्ट्रेट आप भाग्यशाली हैं। क्योंकि यह देख पा रहे हैं कि भारतीय क्रांतिकारी अपने सर्वोच्च आदर्श के लिए किस खुशी से मौत को गले लगा सकते हैं।
अंग्रेजी हुकूम इन तीनों वीरों राजगुरु, सुखदेव व भगत सिंह से इस कद्र डरती थी कि मरने के बाद भी तीनों से खौफ खाती थी। हालांकि इससे पहले ही ब्रिटिश सरकार तीनों की फांसी को उम्र कैद में बदलने की अर्जी को नामंजूर कर चुकी थी, फिर भी निर्धारित समय से 11 घंटे पहले ही उन्हें फांसी पर चढ़ दिया गया।
आधिकारिक तौर पर तीनों को 24 मार्च 1931 को फांसी देने का फैसला अदालत ने दिया था। इसके विरोध में हो रहे आक्रोश से ब्रिटिश सरकार इस कद्र डर गई थी कि 11 घंटे पहले ही 23 मार्च 1931 की शाम को फांसी दे दी गई। जिस समय जेल के अधिकारियों ने भगत सिंह को फांसी के लिए चलने की सूचना दी, वे एक किताब पढ़ रहे थे।

अमरता की नजीर का दिन
भारतीय इतिहास में अनेक ऐसे महापुरष हुए हैं, जिन्होंने कभी भी मौत से भय नहीं माना। लेकिन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में 23 मार्च 1931 का अमरता की अनोखी नजीर बना है। इस दिन ने भारतीय इतिहास में जो अमिट छाप छोड़ी है, इसके किस्से हमेशा हमेशा के लिए अमर हो गए हैं।
क्योंकि इन तीनों युवाओं की फांसी ने न सिर्फ भारत की आजादी की लड़ाई को नई दिशा दी, बल्कि भारतीय जन मानस में राष्ट्रप्रेम गहरी ज्वाला भी प्रज्वलित की। आज भी भगत सिंह, सुखदेव थापर और शिवराम राजगुरु का नाम आते ही उनके बलिदान की कहानी जोश भर देती है।
लाहौर पुलिस अधिकारी की हत्या
1928 में लाठीचार्ज के दौरान लाला लाजपत राय की हत्या के स्वतंत्रता सेनानियों ने इसके आदेश देने वाले पुलिस अधीक्षक जेसी स्कॉट की हत्या की योजना बनाई। इस मिशन के लिए सुखदेव को संयोजक बनाया गया। 17 दिसंबर 1928 को उनकी टीम में चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, राजगुरु और जय गोपाल को भी शामिल किया गया।
जब वे पुलिस कार्यालय के पास पहुंचे तो एक अंग्रेज पुलिस अधिकारी लाल रंग की मोटरसाइकिल से बाहर की ओर जा रहे थे। जय गोपाल को लगा कि वही स्काट है। उसने राजगुरु का इशारा कर दिया। राजगुरु का चयन इस मिशन में उनके स्टीक निशाने के लिए ही हुआ था।
इशारा मिलते ही इस दौरान राजगुरु के पास रिवाल्वर और भगत सिंह को आटोमेटिक पिस्टल थी। राजगुरु ने इशारा मिलते ही रिवाल्वर से गोली दाग दी। गोली लगने के बाद पता चला कि उन्होंने गलत आदमी को मार दिया है। क्योंकि मरने वाला जेम्स ए. स्काट नहीं, बल्कि जान साउंडर्स था।

लाहौर से निकल भागे, दुर्गा भाभी ने दिया साथ
अंग्रेज अधिकारी जान साउंडर्स की हत्या के बाद अगले दिन शहर की दीवारों पर गुलाबी रंग के पोस्ट लगाए गए कि लाला लाजपत राय की मौत का बदला ले लिया गया है। इसके बाद पुलिस की नाकेबंदी की थी। यहां से बच कर निकलना संभव नहीं था। ऐसे में भगवती चरण वोहरा की पत्नी दुर्गा भाभी से पूछा गया कि वह किसी की पत्नी बन कर उनको लाहौर से बाहर निकालने में मदद कर सकती हैं।
उन्होंने इसमें मदद के लिए समहति दे दी। इसके बाद 20 दिसंबर को सुबह भगत सिंह ओवरकोट पहने हुए उनकी पत्नी के रूप में दुर्गा भाभी एक तांगे से लाहौर रेलवे स्टेशन पहुंच गए। पहचान से बचने के लिए भगत सिंह ने अपने ओवरकोट का कॉलर को ऊंचा कर लिया था। उनका एक हाथ कोट की जेब था, जबकि एक हाथ दुर्गा भाभी के बेटे शचि को पकड़ा था। इस दौरान राजगुरु ने नौकर की भूमिका बनाई। और पाजामे के ऊपर पुराना कोट पहन लिया।
यहां भगत सिंह ने 14 डाउन देहरादून एक्सप्रेस के 3 टिकट खरीदे। इसमें भगत सिंह और दुर्गा भाभी के लिए प्रथम श्रेणी के और सुखदेव के लिए थर्ड क्लास का टिकट खरीदा। लखनऊ स्टेशन पर राजगुरु प्लान के तहत भगत सिंह अलग हो गए और आगरा चले गए।
फांसी नहीं गोली मार दी जाए
सांडर्स की हत्या के करीब करीब 4 महीने बाद ही यानी 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने केंद्रीय विधान सभा में बम फेंका। यहां से गिरफ्तारी होने के बाद जेल में राजनीतिक कैदी का दर्जा पाने के लिए उन्होंने लंबी भूख हड़ताल भी की। यह इन वीरों की महान वैचारिक स्थिति का दर्शन करवाते हैं।
7 अक्टूबर 1930 को विशेष ट्राइब्यूनल ने भगत सिंह, सुखदेव तथा राजगुरु को मौत की सजा सुनाई। इस फैसले के खिलाफ अपील के लिए कई बड़े नेताओं ने प्रयास किया, लेकिन भगत सिंह ने इससे साफ मना कर दिया। क्योंकि उनका मानना था कि विदेशी अदालत से न्याय की उम्मीद करना बेकार है। है। हालांकि भगत सिंह ने पंजाब के गवर्नर को एक पत्र लिखा, जिसमें मांग की कि उनको फांसी देने के बजाय एक युद्धबंदी की तरह गोली मारी जाए। हालांकि यह अपील स्वीकार नहीं हुई।
फांसी से पहले लगाए इंकलाब जिंदाबाद के नारे
भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांस देने से पहले शाम करीब 4 बजे सभी कैदियों को बैरेक में बंद कर दिया गया। इसके बाद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को बैरेक्स से बाहर निकला। उनकी मांग पर तीनों के हाथ नहीं बांधे गए। तीनों ने एक दूसरे को गले लगाया। जब वे फांसी के तख्ते की ओर जा रहे थे, उनमें अलग ही हौसला था।
भगत सिंह के बाएं ओर सुखदेव और दाएं ओर राजगुरु चल रहे थे। तीनों ने अपनी बाहें जोड़ रखी थी। इस दौरान भी भगत सिंह ने एक गाना गया। इसके बोल थे, न निकलेगी न मरकर वतन की उल्फ़त – मेरी मिट्टी से भी ख़ुिशबू-ए-वतन आएगी। 23 मार्च 1931 की शाम करीब 7:30 बजे तीनों क्रांतिकारियों को लाहौर सैंट्रल जेल में फांसी दे दी गई। रातों रात उनके शवों को सतलुज नदी के तट पर जला दिया गया।










