Neta ji subhash chander boss : भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के रीयल हीरो नेताजी सुभाष चंद्र बोस
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बनाई पहचान, भारतीय नेता के रूप में मिली विश्व भर में मान्यता
Neta ji subhash chander boss : जब भी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास उठाया जाता है, इसमें वे पन्ने अपनी अलग पहचान रखते हैं, जिन पर नेताजी लिखा हुआ है। सुभाष चंद्र बोस स्वतंत्रता आंदोलन के ऐसे रीयल हीरो थे, जिनको भारत में ही नहीं, विश्व भर में नेताजी के रूप में पहचान मिली। विश्व भर में उनको भारतीय नेता के रूप में मान्यता मिली। भारत को ब्रिटिश सत्ता से आजादी दिलवाने के लिए नेताजी ने जो रास्ता चुना, वह अपने आप में बहुत कष्ट भरा रहने वाला था।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के असंख्य लोगों ने अपना योगदान दिया, लेकिन जिस प्रकार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की आवाज को उठाया, यह काबिलियत सिर्फ नेताजी में ही रही। यही चीज उनको अन्य देश भक्तों से अलग करती है। (neta ji) नेता जी ने सशस्त्र तरीके से आजादी लेने के लिए अपनी फौज तक बना ली। गुलामी के दौर में यह आसान नहीं था। इसके लिए कितनी ही मेहनत और संघर्ष लगा।
Neta ji subhash chander boss : नेताजी के लिए कमांडर ने खाली करवा दिया अपना केबिन
उनकी विदेश यात्राओं में जर्मन शासक हिटर से मुलाकात काफी महत्वपूर्ण है। इसके लिए नेता जी ने क्या कुछ नहीं सहा। दुर्गम नदियों और समुंद्रों को पार किया। पनडुबी तक में यात्रा की, जाे काफी जोखिम भरी रही। इस यात्रा के बारे में एक किस्सा यह है कि इस यात्रा के दौरान नेता जी का पूरा ख्याल जर्मन नौसैनिकों द्वारा रखा गया। जापानी पनडुब्बी में जाने के बाद उनको काफी अच्छा व्यवहार मिला। जापानी पनडुब्बी के कमांडर मसाओ तरोओका ने नेताजी के लिए अपना केबिन तक खाली करवा दिया था।
Neta ji subhash chander boss : चार बार खिलाया जाता खाना
नेता जी की यात्रा के बारे में आबिद हसन ने अपनी किताब में लिखा है कि जर्मन सैनिक नेता जी का खास ख्याल रखते थे। नेता जी के लिए खाना बनाने में खास भारतीय मसालों का प्रयोग होता था। (subhash chander boss) उनको दिन में चार बार खाना उपलब्ध करवाया जाता। एक बार तो नेता जी ने जापानी कमांडर से यह भी कह दिया कि क्या उन्हें फिर से भोजन खाना पड़ेगा।
Neta ji subhash chander boss : जीवन में एक बार मिले हिटलर से
नेताजी अपने जीवन में एक ही बार जर्मनी तानाशाह अडाल्फ हिटलर से मिले। यह मुलाकात 29 मई 1942 को हुई। इस दौरान उनकी मुलाकात के दौरान जर्मन विदेश मंत्री जोआखिम वॉन रिबेनट्रॉप और विदेश राज्य मंत्री विलहेल्म केपलर भी मौजूद रहे। इस दौरान पॉल शिमिट ने नेताजी के लिए दुभाषिये के रूप में काम किया।

Neta ji subhash chander boss : हिटलर के भारत के बारे में विचार
मान्यता है कि हिटलर भारत के बारे में अच्छी सोच नहीं रखता था। वह चाहता था कि भारत ब्रिटेन के अधीन रही रहे। ऐसे में अपनी मुलाकात के दौरान हिटलर की आत्मकथा मीन कैम्फ के बारे में भी बात की। नेताजी का मानना था कि उनकी किताब में भारत की बाजादी के बारे में जो तथ्य हैं, उनको ब्रिटेन में तोड़-मरोड़ कर पेश किया जा रहा है।
इसको लेकर बोस ने स्वयं हिटलर से कहा था कि इसको लेकर वे उचित समय पर ही दें। हिटलर ने ही सुभाष चंद्र बोस को जापान पहुंचाने के लिए पनडुब्बी की व्यवस्था करवाई थी। हिटलर नहीं चाहते थे कि नेताजी हवाई जहाज से जाएं। ऐसा करने पर खतरा बना रहता। हिटलर की राय थी कि उनकी यह यात्रा छह सप्ताह में पूरी हो जाएगी, लेकिन इसमें तीन महीने का समय लग गया।
Neta ji subhash chander boss : तीन महीने का जनलेवा सफर
पनडुब्बी में यात्रा आसान नहीं थी। यहां डीजल की महक रहती थी और अंदर का माहौल दमघोटू रहा। यह यात्रा नेता जी ने 9 फरवरी 1943 को शुरू की थी। उनके साथ आबिद हसन भी थे। जर्मनी बंदरगाह कील यात्रा शुरू की थी। आबिद हसन अपनी किताब सोलजर रिमेंबर्स में लिखते हैं कि पनडुब्बी में चलने फिरने के लिए भी जगह नहीं थी। जिस जर्मन पनडुब्बी में नेताजी ने सफर किया था, उसको 1944 में प्रशांत महासागर में डुबो दिया गया। तब इसमें सवार 56 नौसैनिकों की मौत हो गई थी।
Neta ji subhash chander boss : जापान में दिया दिल्ली चलो का नारा
नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने देश के अंदर और बाहर आजाद हिंद फौज के लिए काफी प्रयास किए। जापान में वहां के प्रधानमंत्री हिदेकी तोजो के साथ उन्होंने 6 जुलाई 1943 को सिंगापुर में आजाद हिंद फौज आईएनए के सैनिकों का निरीक्षण करते हुए दिल्ली चलो का नारा दिया। यह नारा भारत की आजादी में काफी महत्वपूर्ण रहा। उनके नारे से प्रभावित होकर हजारों लोग उनके साथ जुड़े। करीब 40 हजार युद्धबंदी आजाद हिंद फौज का हिस्सा बने थे।










