Sentinel Island : भारत का ऐसा द्वीप, जहां बाहरी लोगों का जाना है मना
60 वर्ग किलोमीटर के इस द्वीप पर जो गया नहीं आया वापस, सुनामी में भी नहीं ली बाहरी दुनिया की मदद
Sentinel Island : भारत देश भिन्नताओं से भरा हुआ है। यहां अनेक प्रकार की भाषा, बोलियां, रहन-सहन मौसम और जलवायु मिलते हैं। देश में एक ऐसा भी द्वीप है, आज तक बाहरी लोगों का जाना मना है। इस द्वीप पर रहने वाले लोग आज भी आदी मानव की तरह ही रहते हैं और आधुनिक सभ्यता से पूरी तरह से कटे हुए हैं। आइए आज इस द्वीप के बारे में जानकारी देते हैं।
यह द्वीप बंगाल की खाड़ी में है और इसको नार्थ सेंटिनल आइलैंड (North Sentinel Island) के नाम से जाना जाता है। हालांकि यह द्वीप अंडमान और निकोबार द्वीप समूह हिस्सा है, लेकिन अकेला ऐसा द्वीप है, जहां लोग तो रहते हैं, लेकिन किसी भी बाहरी व्यक्ति को यहां जाने की अनुमति नहीं है। ऐसे में इसको दुनिया की सबसे रहस्यमयी जगह भी कहा जाता है। इस द्वीप पर रहने वाले लोगों को सेंटिनली कहते हैं। आज तक यह लोग बाहर की दुनिया से पूरी तरह से कटे हुए हैं। यहां जाने वालों पर हमला होता है और सेंटिनली लोग आत्म रक्षा के तौर पर तीरों से हमला कर उसे या तो भगा देते हैं, या फिर मार देते हैं।
भारतीय प्रशासनिक क्षेत्र में है द्वीप
यह द्वीप बेशक दुनिया या देश से कटा हुआ है, लेकिन भारतीय प्रशासनिक क्षेत्र का हिस्सा है। प्रशासनिक रूप से यह दक्षिण अंडमान जिले का हिस्सा है और राजधानी पोर्ट ब्लेयर से करीब 50 किलोमीटर पश्चिम में है। इस द्वीप की विशेषता यह है कि यह चारों तरफ से कोरल रीफ यानी मूंगा चट्टानों से घिरा है। इसके चलते यहां पर जहाज और नाव भी नहीं पहुंच पाते। हालांकि 2004 में आई सुनामी के कारण यहां की टेक्टोनिक प्लेट खिसक गई और द्वीप कुछ ऊपर उठ गया।
सेंटिनली जनजाति के बारे में दुनिया को नहीं जानकारी
यहां रहने वाले सेंटिनली लोग बहुत ही रहस्यमयी हैं। इनके बारे में दुनिया को आज तक भी कुछ खास नहीं पाता है। यहां के लोग खेती नहीं करते और शिकार करके ही जीवन चलाते हैं। हालांकि जंगल में उगने वाले फल-सब्जियां भी इनका आहार होते हैं। इसके अलावा इन लोगों की भाषा और संस्कृति कैसी है, इसके बारे में लोगों कोई जानकारी नहीं है। इसका मुख्य कारण है कि यहां के लोग किसी भी बाहरी व्यक्ति को अपने पास नहीं आने देते। भारत सरकार द्वारा भी यहां जाने पर प्रतिबंध लगाया गया है। यहां की जनसंख्या के बारे में भी सिर्फ अनुमान ही लगाया जाता है।
बाहर आते ही होई गई थी मौत
बात 1880 की है, जब एक ब्रिटिश अधिकारी मॉरिस विडाल पोर्टमैन द्वारा यहां पहुंच कर एक बुजुर्ग जोड़े और चार बच्चों को पकड़ लिया था। इनको जबरन पकड़ कर पोर्ट ब्लेयर पाया गया। यहां से बाहर आने के बाद कुछ ही समय में बुजुर्ग जोड़े का निधन हो गया था। बच्चे भी गंभीर बीमार हो गए। ऐसे में उनको वापस वहीं छोड़ दिया गया। ऐसा माना जाता है कि इसके बाद से ही यहां के लोग किसी को भी अपने पास नहीं आने देते।
1 बार बिना हथियारों के किनारे पर आए लोग
अलग-अलग लोगों द्वारा इनसे संपर्क करने का प्रयास किया जाता रहा। इनमें से एक रहे त्रिलोकनाथ पंडित। वे भारत सरकार की तरफ से लगातार लंबे समय सतक इस जनजाति से संपर्क करने का प्रयास करते रहे। इसके लिए उनको कई प्रकार के उपहार पहुंचाए गए। इसके बाद 1991 में पहली बार इस जनजाति के लोग बिना हथियारों के समुद्र के किनारे यह उपहार लेने पहुंचे। इन लोगों के जीवन को देखते हुए सरकार द्वारा यह अभियान बंद कर दियया गया।
राहत दल पर भी चलाए तीर
हिंद महासागर में 2004 में आई सुनामी के बाद सरकार इन लोगों को लेकर चिंतित थी। इस पर भारतीय तट रक्षक दल द्वारा हेलीकॉप्टर से यहां पर राहत सामग्री पहुंचने का प्रयास किया, लेकिन सेंटिनली जनताति के लोगों ने हेलीकॉप्टर पर तीर चला दिया। इससे साफ हो गया कि यह लोग सुरक्षित हैं। इसके बाद यह अभियान नहीं चला।
ईसाई मिशनरी का शव भी नहीं आया वापस
बात 2018 की है, जब अमेरिका के एक ईसाई मिशनरी जॉन एलन चाऊ ने इस द्वीप पर मौजूद लोगों के बीच जाने की योजना बनाई। हालांकि वे अवैध रूप से यहां धर्म प्रचार के लिए पहुंचे थे। जब वे द्वीप पर पहुंचे तो लोगों ने उन पर तीर से हमला कर दिया और इसमें उनकी जान चली गई। ऐसे में उसका शव भी वापस नहीं आ पाया। हालांकि उनकी डायरी से कुछ जानकारियां इन लोगों के बारे में मिली हैं।










