Labour Day : 1 मई को क्यों मनाया जाता है मजदूर दिवस, संघर्ष और बलिदान की कहानी
8 घंटे काम की मांग को लेकर शुरू हुआ वह आंदोलन जो विश्व भर के मजदूरों को एकजुट कर गया
Labour Day : हर साल जब भी 1 मई का दिन आता है, अलग-अलग संस्थाओं द्वारा मजदूरों को समर्पित विभिन्न आयोजन किए जाते हैं। आइए आज आपको बताते हैं कि मजदूर दिवस 1 मई को ही क्यों मनाया जाता है। इसका इतिहास जुड़ा है 1 मई 1886 से जब अमेरिका में मजदूरों का बड़ा आंदोलन भड़का था।
आज हम जिस डिजिटल क्रांति में जी रहे हैं, यह बहुत लंबा दौर तय करके आई है। क्योंकि शुरूआत में मजदूर नहीं गुलाम होते थे। उनके न तो काम करने के घंटे तय होते थे, न वेतन और सुविधाएं। रात दिन काम और भरपेट खाना भी नहीं। इसके बाद जब पश्चिम के देशों में औद्योगीकरण शुरू हुआ तो और मजदूरों से सुबह से शाम तक काम करवाया जाता था। इसके विरोध में काम का समय निर्धारित करने के लिए लंबा आंदोलन चला।
सिर्फ 8 घंटे काम का फैसला
यह लड़ाई कंपनियों और फैक्ट्रियों को भी प्रभावित कर रही थी। 8 घंटे ही काम करने का मतलब था कि अधिक मजदूरों को जरूरत यानी अधिक खर्च। ऐसे में साल 1884 का अक्टूबर महीना आया तो अमेरिका और कनाडा की विभिन्न ट्रेड यूनियनों का संघर्ष तेज हो गया। मजदूर यूनियनों ने तय कर लिया कि 1 मई 1886 के बाद से कोई भी मजदूर प्रतिदिन 8 घंटे से अधिक समय तक काम नहीं करेगा। निर्धारित किए गए दिन को कई शहरों में लाखों श्रमिकों ने हड़ताल शुरू कर दी। इस आंदोलन का केंद्र बना अमेरिका का शहर शिकागो।
जब हिंसक हुआ आंदोलन और बदल गया नियम
1 मई को शुरू हुआ यह आंदोलन पहले 2 दिन शांतिपूर्ण तरीके से चला। 3 मई का दिन इस आंदोलन में निर्णायक रहा। क्योंकि तीन मई की शाम को शिकागो स्थित मैकॉर्मिक हार्वेस्टिंग मशीन कंपनी के बाहर हिंसा भड़क गई। इसमें पुलिस द्वारा की गई गोलीबारी में दो मजदूरों की मौत हो गई।
इसके अलगे दिन यानी 4 कई को फिर से मजदूरों और पुलिस के बीच झड़प हुई और कुल 12 लोगों की जान चली गई। इसमें 7 पुलिस कर्मी भी शामिल थे। इसके चलते ही 1 मई मजदूरों के लिए बेहद खास हो गया।
अमेरिका से दुनिया भर में फैली मजदूरों की क्रांति
उस दौर में सूचनाओं के संसाधन आज की तरह नहीं थे। इसके बावजूद अगले तीन साल में यानी साल 1889 और 1890 तक दुनिया भर के कई देशों में मजदूरों के प्रदर्शन हुए। 1980 में ब्रिटेन के हाइड पार्क में फिर सक 1 मई को मजदूरों प्रदर्शन शुरू किया। यहां भी मांग वही आठ घंटे काम। इसी दौरान काम के घंटों के साथ-साथ अन्य सुविधाओं की भी मांग उठने लगी। हालांकि भारत में 1923 के बाद ही मजदूर दिवस की प्रथा शुरू हुई है।
भारत में 1 मई को सार्वजनिक अवकाश की मांग
इसी दौरान भारत में भी मजदूरों के हितों की मांग उठने लगी। कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे फिर हिंदुस्तान लेबर किसान पार्टी के नेता मलयापुरम सिंगारवेलु चेतियार के नेतृत्व में चेन्नई में आयोजित कार्यक्रम बहुत ही भव्य हुआ। इस दौरान ही चेतियार ने 1 मई को राष्ट्रीय अवकाश घोषित करने की मांग की।
बदल गई मजदूरों की परिभाषा
हालांकि जब मजदूर दिवस की शुरूआत हुई, तब परिस्थितियां भिन्न थी। आज के दौर में विशेषकर कोरोना काल के बाद वर्क फ्राम होम जैसे नए तकनीकी पहलू जुड़ गए हैं। रिमोट वर्किंग ने श्रमिकों का काम करने का तरीका ही बदल दिया है। हालांकि भारत में मजदूरों की स्थिति आज भी काफी दयनीय है, लेकिन मशीनों के बढ़ते प्रभाव से मजदूरों के समक्ष रोजगार का संकट भी खड़ा हो गया है। ऐसे में आज भी इस दिन का महत्व पहले की तरह बनी बना हुआ है।










