Kohinoor Diamond : कोहिनूर सिर्फ एक हीरा नहीं रियासतों और विरासतों का इतिहास, जानें हीरे से जुड़ी हर जानकारी
जोहरान ममदानी के बयान के बाद फिर से चर्चाओं में है कोहिनूर
Kohinoor Diamond : कोहिनूर का नाम आते ही कई सारी उपमाएं सिर उठाने लगती हैं। क्योंकि कोहिनूर से हर असामान्य वस्तु या व्यक्ति की तुलना होती है। कहने को तो यह महज एक 105.6 कैरेट का हीरा है, लेकिन इसका इतिहास कोहिनूर को खास नहीं बेहद खास बना देता है। कोहिनूर पर शुरू से ही भारत अपना दावा कर रहा है। यह दावा सही भी है। क्योंकि इतिहासकार भी मानते हैं कि कोहिनूर भारत का ही है।
हालांकि वर्तमान में कोहिनूर हीरा ब्रिटेन की महारानी के ताज में जड़ा गया है और भारत से जाने के बाद इसके मूल स्वरूप के साथ काफी छेड़खानी भी की गई है। इतिहास में झांके तो पता चलता है कि कोहिनूर को भारत में वर्तमान आंध्रप्रदेश राज्य से ही निकाला गया है। कुछ चर्चित तर्क यह भी हैं कि इस हीरे को भारत में ही किसी मूर्ति की आंख से निकाला गया है
क्यों चर्चा में है कोहिनूर हीरा
दरअसल पिछले दिनों न्यूयॉर्क शहर के मेयर जोहरान ममदानी ने एक बयान दिया था। इसमें उन्होंने कहा था कि ब्रिटेन के किंग चार्ल्स से मुलाकात के दौरान यदि उनकी अलग से बात होती है तो वे कोहिनूर लौटाने के लिए कहेंगे। हालांकि इन दोनों की मुलाकात हो चुकी है, लेकिन कोहिनूर को लेकर अभी तक कोई जानकारी नहीं आई है। यह भी साफ नहीं है कि कोहिनूर को लेकर दोनों के बीच कोई बात हुई भी या नहीं। ऐसे में कोहिनूर का इतिहास बहुत ही रोचक हो जाता है।
1849 में आया अंग्रेजों को हाथ
दरअसल जिस समय कोहिनूर हीरा अंग्रेजों के हाथ पड़ा, इससे पहले वह महाराजा रणजीत सिंह के पास था। 29 मार्च 1849 को महाराजा रणजीत सिंह के 10 वर्षीय बेटे महाराजा दलीप सिंह ने अपना साम्राज्य अंग्रेजों अधीन कर दिया। इस दस्तावेज पर हस्ताक्षर होने के बाद सिख साम्राज्य के साथ-साथ विश्व प्रसिद्ध कोहिनूर हीरा भी ईस्ट इंडिया कंपनी के कब्जे में आ गया।
क्या हैं प्राचीन तथ्य
कोहिनूर का महाराजा दलीप सिंह से अंग्रेजों के हाथों में जाना आधुनिक इतिहास की घटना है, लेकिन कोहिनूर को इतिहास इससे भी पुराना है। क्योंकि इतिहासकारों का मानना है कि कोहिनूर को तुर्कों ने दक्षिण भारत के एक मंदिर में स्थापित मूर्ति की आंख से निकाला था।
कोहिनूर को लेकर लिखी गई मशहूर पुस्तक कोहिनूर द स्टोरी ऑफ द वर्ल्ड्स मोस्ट इनफेमस डायमंड में विलियम डेलरिम्पल ने बताया है कि 1750 में पहली बार कोहिनूर का जिक्र मिलता है। इसको फारसी इतिहासकार मोहम्मद मारवी द्वारा ईरानी शासक नादिरशाह के भारत में आने के वर्णन में शामिल किया गया है। मारवी ने दावा किया है कि स्वयं उन्होंने कोहिनूर हीरे को अपनी आंखों से देखा है।
नादिरशाह का बाजूबंद
कोहिनूर हीरा बेशक किसी समय में भारत के प्राचीन मंदिर की मूर्ति की आंख रहा हो, लेकिन इसको बाद में तख्त-ए-ताऊस के ऊपरी भाग में लगाया गया था। बाद में नादिरशाह ने जब दिल्ली से लूटा तो यह ईरान चला गया। उस समय कोहिनूर हीरे का आकार मुर्गी के छोटे अंडे से मिलता जुलता था। नादिरशाह की बाजू पर बांधने के लिए कोहिनूर को तख्त-ए-ताऊस से निकाला गया।
हीरे के लिए बदली गई पगड़ी
कोहिनूर को लेकर एक बहुत ही रोचक किस्सा इतिहास में आता है। यह भी काफी प्रचलित है कि पहली बार लोगों की नजर में कोहिनूर हीरा नादिरशाह के पास रहते ही आया। इतिहास में यह भी दर्ज है कि नादिरशाह के दरबार की नर्तकी नूर बाई ने उन्हें बताया कि मोहम्मद शाह की पगड़ी में कोहिनूर हीरा छिपाया गया है। इसके बाद नादिरशाह ने मोहम्मद शाह के समक्ष अपनी मित्रता के लिए पगड़ियां बदलने की पेशकश रखी।
जब उनकी पगड़ियां बदली गई तो कोहिनूर नादिरशाह को मिल गया। नादिरशाह कुल 57 दिनों तक भारत में रहा। इसके बाद 16 मई 1739 को वापसी की तो कोहिनूर के साथ तख्त-ए-ताऊस के साथ मुगलों की बेशुमार दौलत अपने साथ ले गया।
रणजीत सिंह के पास कैसे पहुंचा कोहिनूर हीरा
हालांकि नादिरशाह कोहिनूर को लूट कर अपने साथ तो ले गया, लेकिन कुछ ही समय के बाद उसकी हत्या कर दी गई। ऐसे में कोहिनूर उसके अंगरक्षक अहमद शाह अब्दाली के हाथों में आ गया। इसको लेकर भारत के राष्ट्रीय अभिलेखागार में भी काफी विस्तृत जानकारी है। आखिरकार कोहिनूर हीरा 1813 में महाराजा रणजीत सिंह को मिल गया। 1839 में महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद उनके 5 वर्षीय बेटे दलीप सिंह को 1843 में राजा बनाया गया। यहीं से यह हीरा अंग्रेजों को मिला।
विशेष जहाज से भेजा इंग्लेंड
इस हीरे को लेने के लिए स्वयं लॉर्ड डलहौज़ी लाहौर पहुंचे थे। उन्होंने तोशेखाने से इस हीरे को लिया और विशेष पानी जहाज से महारानी विक्टोरिया को भेजा गया। बताया जाता है कि तब कोहिनूर का वजन काफी अधिक था, लेकिन वहां जाने के बाद इसकी चमक बढ़ाने के लिए इसको तराशा गया। फिलहाल कोहिनूर हीरे का वजन करीब 105.6 कैरेट आंका जाता है।
कैसे मिला कोहिनूर नाम
दरअसल कोहिनूर हीरे को यह नाम मिलने के पीछे भी दिलचस्प किस्सा है। माना जाता है कि यह नाम कोहिनूर को 1739 में मिला। ईरानी शासक नादिरशाह के पास जब यह हीरा मुगल सम्राट मुहम्मद शाह से आया, तब इसको देख कर उन्होंने उत्साह में चीखते हुए इसको कोह-ए-नूर कहा। इसका अर्थ होता है प्रकाश का पर्वत।










