Mahabharata : पूरी कुरुक्षेत्र भूमि को बना दिया था शमशान

युद्धिष्ठिर के आदेश में हुआ शवों का सामूहिक अंतिम संस्कार

Mahabharata : आज कुरुक्षेत्र की भूमि पर अंतरराष्ट्रीय गीता जयंती समारोह मनाया जा रहा है। यह समारोह हमें गीता के संदेश के के साथ -साथ महाभारत के युद्ध की यादें ताजा करने का भी मौका दे रहा है। महाभारत के युद्ध में 18 अक्षौहिणी सैनिकों ने भाग लिया था। इसमें कौरवाें की ओर से 11 व पांडवों की ओर से 7 अक्षौहिणी दल सैनिकों ने हिस्सा लिया।

जाहिर सी बात है कि युद्ध में इतने अधिक सैनिकों ने लड़ाई लड़ी तो लाखों सैनिकों की मौत भी हुई होगी। इनका अंतिम संस्कार बहुत ही मुशकिल था। लाखों सैनिकों की तो पहचान भी संभवन नहीं हो पाई। (Geeta jayanti) ऐसे में माना जाता है कि युद्ध के उपरांत महाराजा युद्धिष्ठिर के आदेश पर पूरी युद्ध भूमि को ही शमशान बना दिया गया था।

अक्षौहिणी शब्द से ही सेना की विशालता का अंदाजा लगया जा सकता है। यह रथी, महारथी, हाथी सैनिक व घुड़सवारों के साथ पैदल सैनिकों का एक विशेष दल बनता है, जिसको 1 अक्षौहिणी कहा जाता है। (Kurukshetra) गणना के अनुसार एक अक्षौहिणी सेना में 21870 रथ, 21870 रथ हाथी, 109350 सैनिकों के साथ 65610 घोड़े होते हैं। इसको मिलाकर एक अक्षौहिणी सेना बनती है। जबकि महाभारत के युद्ध में 18 अक्षौहिणी सेना ने भाग लिया।

कुरुक्षेत्र के मैदान में लड़ाई में लाखों सैनिकों रथियों व महारथियों की हत्या की गई, लेकिन इकसे बाद भी आज तक किसी का शव नहीं मिला। माना जाता है कि इस युद्ध में इतने अधिक योद्धाओं की हत्या हुई, कि रक्त से मिट्टी का रंग भी लाल हो गया।

Kurukshetra : हालांकि पांडवों ने धर्म युद्ध लड़ कर राज्य जीत लिया, लेकिन इस युद्ध में हुए खून खराबे से वे भी विचलित हो गए। मान्यता है कि इसके बाद पांडवों ने राज्य सत्ता को छोड़ दिया और परिक्षित को राजपाट संभलवा दिया। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण वैकुंठ गमन कर गए और पांडव हस्तिनापुर का सिंहासन परीक्षित को दे कर द्रौपदी के साथ हिमालय की प्रस्थान कर गए।

पूरी कुरुक्षेत्र भूमि को बना दिया था शमशान
पूरी कुरुक्षेत्र भूमि को बना दिया था शमशान

Mahabharata : 18 दिन चल युद्ध

हस्तिनापुर की गद्दी के लिए महाभारत का युद्ध कुरुक्षेत्र की भूमि पर 18 दिनों तक लड़ा गया। इस दौरान लाखों सैनिकों की मौत हुई। युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। इसमें काफी सैनिक ऐसे थे कि उनकी पहचान करना भी संभव नहीं हो पाया। ऐसे में युधिष्ठिर आदेश दिया और कुरुक्षेत्र की भूमि पर आग लगा दी गई, ताकि सभी योद्धाओं के शव जल सकें। आंकड़ों की बात करें तो महाभारत के युद्ध में 1 अरब 66 करोड़ 20 हजार योद्धा वीरगति को प्राप्त हुए। हालांकि इसमें वह संख्या नहीं है, जो लापता हो गए। जिनकी पहचान नहीं हुई और मिले नहीं ऐसे सैनिकों की संख्या 24,165 बताई जाती है।

Mahabharata : 5 पांडव व और 100 कौरवों के बीच थी लड़ाई

बेशक इस युद्ध में 18 अक्षौहिणी सेना ने भाग लिया, लेकिन लड़ाई पांडवों व कौरवों के बीच थी। पांडव पांच थे और कौरव 100 थे। युद्ध में जान गंवाने वालों के लिए भी विशेष नियम होता था। यही कारण है कि आज तक मारे गए लोगों के शव नहीं मिले हैं। दरअसल यह युद्ध सुबह सूरज उगने के साथ शुरू होता था और शाम के समय सूरज ढलने के साथ ही बंद हो जाता था। इस दौरान दोनों तरफ की सेनाओं द्वारा अपने अपने मारे गए योद्धाओं व सैनिकों का अंतिम संस्कार कर दिया जाता था। दुर्योधन की मौत के बाद युद्ध समाप्त हुआ था। इस दौरान बचे हुए सैनिकों के शवों को महाराज युद्धिष्ठिर ने जलवा दिया था। ऐसा माना जाता है कि प्रतिदिन 10 हजार से भी अधिक सैनिकों की मौत युद्ध के दौरान होती थी।

Mahabharata : ऐसे होती है अक्षौहिणी की गणना

अक्षौहिणी सेना की गणना हम आपकों ऊपर बता चुके हैं। क्यों की यह विशाल सेनाएं सेना युद्ध में उतरी थी, ऐसे में इसकी की तैयारी भी विशेष थी। पहले एक छोटी यूनिट के रूप में ऐ पत्ती होती थी। इसमें एक रथ, एक हाथी, पांच पैदल सैनिक और तीन घोड़ों को शामिल किया जाता था। पत्ती की तिगुनी संख्या को सेनामुख कहा जाता है। तीन सेनामुख को मिलाकर एक गुल्म बनता है। तीन गुल्म से एक गण, तीन गण को मिलाने से एक वाहिनी तैयार हाती है। तीन वाहिनियों को एक पृतना तैयार किया जाता है। तीन पृतना की एक चमू बना और तीन चमू की एक अनीकिनी गठित की। 10 अनीकिनी को ही एक एक अक्षौहिणी कहा जाता है।

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