Waste To Bio CNG : अब कचरा नहीं रहेगा समस्या, कचरे से सीएनजी बनाने की तैयारी
धनबाद के केंद्रीय खनन एवं ईंधन अनुसंधान संस्थान ने शुरू किया पायलट प्रोजेक्ट
Waste To Bio CNG : देश भर में लोगों और प्रशासन के लिए समस्या बन रहा कचरा अब काम की चीज होने वाला है। क्योंकि घरों से निकलने वाले कचरे से अब सीएनजी बनाई जाएगी। इसके लिए झारखंड के धनबाद स्थित केंद्रीय खान एवं ईंधन अनुसंधान संस्थान यानी (सिंफर) ने इसके लिए पहल की है। इसको पायल प्रोजेक्ट के रूप में शुरू करते हुए 3 घन मीटर क्षमता वाला बायो-सीएनजी प्लांट स्थापित किया गया है। फिलहाल इस प्लांट में नगर निगम द्वारा एकत्रित किए जाने वाले कचरे और खाद्य अपशिष्टों से बायो-सीएनजी तैयार करने की योजना है।
इसके लिए सिंफर द्वारा विशेष तैयारी करते हुए वरिष्ठ महिला विज्ञानी डॉ. वीए सेल्वी को काम सौंपा है। डा. सेल्वी के नेतृत्व में इस परियोजना से जहां कचरा प्रबंधन में मदद मिलेगी, वहीं ऊर्जा भी बढ़ेगा। लंबे समय में यह परियोजना शुरू होने के बाद देश की निर्भरता जीवाश्म ईंधन पर कम होगी। ऐसे में यह परियोजना सीधे तौर पर देश की अर्थव्यवस्था के लिए बहुत अच्छी होने जा रही है। इसके लिए तीन घन मीटर का बायो सीएनजी प्लांट बनाया गया है और इसमें प्रतिदिन करीब 10 टन कचरे की खपत होगी। इसकी गुणवत्ता के अनुसार ही सीएनजी का उत्पादन होगा।
लगातार बढ़ रहा है कचरा
दरअसल देश में ग्रामीण क्षेत्रों के साथ ही शहरी क्षेत्रों में भी आबादी बढ़ रही है। इसका सीधा असर घरों से निकलने वाले कचरे पर भी पड़ रहा है। ऐसे में इस कचरे का प्रबंधन करना प्रशासन के लिए भी बड़ी चुनौती बन रहा है। अब सिंफर द्वारा जो प्रयास किया जा रहा है, इससे कचरा आफत नहीं कमाई का माध्यम बन सकता है। अभी तक कचरा प्रबंधन पर सरकार को मोटा खर्च करना पड़ रहा है। जब कचरे से कमाई होगी तो इसका प्रबंधन भी आसान होगा।
कचरे से सीएनजी बनाने की तकनीक
कचरे से सीएनजी बनाने के लिए एक प्रक्रिया अनाई जाएगी। इसके तहत जो भी कचरा नगर निगम द्वारा संग्रहण प्लांट में लाया जाता है, इसको छंटाई कर डंपिंग यार्ड में रखा जाएगा। यहां छोटे व बड़े कचरे को अलग करने के लिए दो व्यवस्था होंगी। जैसे छोटा कचरा हैमर मिल में जाएगा और बड़ा कचरा बायो ग्राइंडर में रहेगा। इसको पानी के साथ मिला कर गाढ़ा घोल बनाया या स्लरी बनाई जाएगी। इसको पंप के माध्यम से से फीड टैंक में भेजा जाएगा और यहां से यह स्लरी डाइजेस्टर में जाएगी।
यहां कुछ दिन रहने के बाद इसी गाढ़े घोल से अब सीएनजी बनाई जा सकेगी। लेकिन यह बायोगैस कच्ची होगी। इसको तैयार करने के लिए गैस को क्लीनिंग सिस्टम में भेजा जाएगा। इस प्रक्रिया के तहत मीथेन गैस को कार्बन डाईआक्साइड से अलग करते हुए मीथेन कम होने के बाद इसको कंप्रेस्ड किया जाएगा। ऐसे करके सीएनजी के रूप में यह गैस तैयार हो जाएगी।
डॉ. सेल्वी के बारे में भी जानें
इस परियोजना का नेतृत्व कर रही डॉ. वीए सेल्वी बहुत ही प्रतिभावान वैज्ञानिक हैं। फिलहाल वे सूक्ष्मजीव मार्ग से कार्बन डाईआक्साइड का अवशोषण, कोयले का जैवमेथेनीकरण, खाद्य अपशिष्ट और नगरपालिका ठोस अपशिष्ट से जैव इथेनाल उत्पादन, जैव-कीटनाशक के रूप में सिलिका समृद्ध संसाधनों से सिलिका कंपोजिट जैसी 24 परियोजनाओं का नेतृत्व कर रही है। इसके अलावा ईंधन के क्षेत्र में उनका काम काफी सराहनीय है।
इसके लिए उनको गेट फेलोशिप, आइआइटी आरएस फेलोशिप, एमएससी में प्रथम स्थान, विश्व खाद्य दिवस पुरस्कार, बीपीए मेरिट पुरस्कार, अपराजिता पुरस्कार, बीके मजूमदार पुरस्कार, एमजी कृष्णा पुरस्कार, महिला गौरव पुरस्कार, जैव प्रौद्योगिकी में सर्वश्रेष्ठ महिला शोधकर्ता पुरस्कार और जीएसआई द्वारा 2025 का सर्वश्रेष्ठ शोध पत्र जैसे पुरस्कार मिल चुके हैं।
फिलहाल डा. सेल्वी औद्योगिक पैमाने पर स्मार्ट एल्गल लिक्विड ट्री (साल्ट) कार्बन डाईआक्साइड अवशोषक, औद्योगिक पैमाने पर सूक्ष्मजीव मार्ग सेकार्बन डाईआक्साइड का अवशोषण, खान अपशिष्ट से दुर्लभ पृथ्वी तत्वों का जैव-खनन सहित अन्य विशिष्ठ शोध परियोजनाओं पर कार्य में शामि हैं।
डा. सेल्वी के नाम 25 से अधिक पेटेंट
डा. सेल्वी के काम डंका बज रहा है। उनके नाम 25 पेटेंट और 80 से अधिक शोध पत्र प्रकाशन हैं। उन्होंने आइआइटीटी खड़गपुर से पीएचडी और आइआइएससी बैंगलोर से पर्यावरण प्रबंधन में पीएचडी की है। वर्तमान में वे नवीकरणीय ऊर्जा और जैव प्रौद्योगिकी में वरिष्ठ प्रधान विज्ञानी हैं।










