Palm Oil Import Duty : क्यों उठ रही है पाम ऑयल पर आयात शुल्क बढ़ाने की मांग
जानें भारत में पाम ऑयल के आने और खपत का इतिहास, आज विश्व के सबसे अधिक पाम ऑयल आयात और खपत वाला देश बन गया है भारत
Palm Oil Import Duty : भारत मुख्य रूप से कृषि प्रधान देश है, लेकिन भी कई प्रकार की खाद्य सामग्री ऐसी हैं, जिनका आयात करना पड़ता है। इसका मुख्य कारण है भारत की बड़ी जनसंख्या। भारत जिन खाद्य वस्तुओं का आयात करता है, उनमें से प्रमुख है खाद्य तेल।
खाद्य तेल में भी सबसे अधिक मात्रा में आता है पाम ऑयल। अब देश के तेलंगाना जैसे राज्य मांग कर रहे हैं कि विदेशों से आने वाले पाम ऑयल (crude palm oil) पर आयात शुल्क यानी इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ाई जाए।
आखिरकार यह मांग क्यों उठ रही है। अर्थशास्त्री डा. ओपी गुप्ता बताते हैं कि स्थानीय उत्पादकों को लाभ देने के लिए आयात शुल्क का बढ़ना जरूरी होता है। यह सिर्फ पाम ऑयल के लिए नहीं अन्य सभी वस्तुओं के लिए निर्धारित फार्मूला है।
क्योंकि इससे बाहर से आने वाली वस्तुएं महंगी हो जाती हैं और स्थानीय उत्पादों की खपत बढ़ती है। भारत अपनी खपत का करीब 60 प्रतिशत खाद्य तेल आयात करता है। इस साल यानी जनवरी 2026 में भारत ने 706,000 मीट्रिक टन पाम ऑयल आयात किया है। वहीं इसकी तुलना एक साल पहले यानी जनवरी 2025 से की जाए तो करीब 3 गुना अधिक है।
क्यों उठ रही है आयात शुल्क बढ़ाने की मांग
दरअसल इसके लिए तेलंगाना के मंत्री तुम्मला नागेश्वर राव द्वारा हाल ही में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान को पत्र लिखा गया है। इसमें आयात शुल्क बढ़ाने की मांग की गई है। ऐसे समय में जब देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी खाद्य तेल का प्रयोग कम करने का आह्वान कर चुके हैं, यह विषय काफी चर्चित हो गया है।
क्योंकि तेलंगाना के कृषि मंत्री का कहना है कि इससे स्थानीय किसानों को लाभ पहुंचेगा। भारत में तेलंगाना सबसे अधिक पाम ऑयल उत्पादक राज्य है। ऐसे में आयात शुल्क बढ़ने से घरेलू पाम ऑयल का उत्पादन और कीमत दोनों ही बढेंगे।
करीब आधी रह गई है इंपोर्ट ड्यूटी
दरसअल पिछले साल विदेशों से आयात होने वाले पाम ऑयल पर आयात शुल्क 16.50 प्रतिशत कर दिया गया है। ऐसे में तेलंगाना सरकार का कहना है कि वर्ष 2018 में पाम ऑयल पर इंपोर्ट ड्यूटी 44 प्रतिशत थी।
उस समय पाम ऑयल उत्पादक किसानों को बेहतर कीमतें मिली। इसके बाद आयात शुल्क 27.50 प्रतिशत हो गया और अब 16.50 प्रतिशत है। इसके कारण भारतीय कंपनियां विदेशों से सस्ता तेल खरीद रही हैं। परिणाम स्वरूप स्थानीय किसानों को नुकसान हो रहा है।
तो कितनी हो इंपोर्ट ड्यूटी
ऐसे में तेलंगाना सरकार का कहना है कि पाम ऑयल पर आयात शुल्क यानी इंपोर्ट ड्यूटी पहले की भांति ही 44 प्रतिशत की जानी चाहिए। इससे भारतीय पाम ऑयल को अच्छा बाजार स्थानीय स्तर पर ही मिल जाएगा। क्योंकि पाम ऑयल अन्य तिलहन फसलों के मुकाबले किसानों को अच्छी आय देता है। एक बार पाम यानी ताड़ के पौधे लगने के बाद इससे अगले 30 साल तक उत्पादन मिलता रहता है।
तेलंगाना में पाम ऑयल का उत्पादन
दरअसल तेलंगाना देश का सर्वाधिक पाम ऑयल या ताड़ पेड़ के बीजों का उत्पादन करता है। तेलंगाना के कृषि मंत्री ने भी लिखा है कि कुल क्षेत्रफल में राज्य की हिस्सेदारी 36 प्रतिशत है। वहीं इस साल में यानी 2026-27 में इसमें 34,000 हेक्टेयर की वृद्धि करने का
लक्ष्य है।
भारत में कैसे आया पाम ऑयल
दरअसल भारत में प्राचीन समय से ही खाद्य तेलों में सरसों, मूंगफली, नारियल जैसे तेलों का प्रयोग होते आया है, लेकिन देश में खाद्य तेलों की कमी के कारण सस्ते विकल्प के रूप में 1970 और 1980 के दशक के दौरान मलेशिया और इंडोनेशिया से पाम ऑयल को आयात किया गया।
तब से यह भारतीय खाद्य तेलों में शामिल हो गया है। आज अधिकतर खाद्य तेलों में पाम ऑयल का कुछ हिस्सा जरूर होता है। यहां तक की रिफाइंड ऑयल से लेकर बटर तक में पाम ऑयल मिलाया जा रहा है।
क्या स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है पाम ऑयल
दरअसल पाम ऑयल को लेकर यह चर्चा आम रहती है कि क्या यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। ऐसे में वरिष्ठ चिकित्सक डा. मनोज सिंह बताते हैं कि पाम ऑयल में सैचुरेटेड फैटी एसिड की मात्रा करीब 50 प्रतिशत है। यह अन्य खाद्य तेलों के मुकाबले बहुत अधिक है।
इससे शरीर में खराब कोलेस्ट्रॉल बढ़ता है। हालांकि इसको यह रूप इसकी प्रोसेस के दौरान मिलता है। यदि कच्चे पाम तेल की बात की जाए तो इसमें विटामिन-A और E होता पाया जाता है। जब इसको प्रोसेस किया जाता है तो यह तत्व नष्ट हो जाते हैं। हालांकि पाम ऑयल में ट्रांस फैट की मात्रा शून्य होती है।










