History Of Rasgulla : बंगाली रसगुल्ले की मिठास भरी कहानी, कैसे दुनिया भर में छा गया स्पंज रसगुल्ला

158 साल पहले शुरू हुआ मीठा और स्पंजी स्वाद का सफर

History Of Rasgulla : जब भी कुछ मीठा खाने का मन होता है विशेषकर गर्मियों के मौसम में तो याद आता है स्पंज रसगुल्ला। स्पंज रसगुल्ला जिस प्रकार खाने में स्वादिष्ट और स्पंजी होता है, इसका इतिहास भी इतना ही मीठा और स्पंजी है। 158 साल पहले पश्चिमी बंगाल से शुरू हुआ यह स्पंजी स्वाद आज दुनिया भर में फैल चुका है। आइए आपको बताते हैं इस स्पंज रसगुल्ले की पूरी यात्रा।

पूरा देश बंगाल की राजनीतिक हलचल में उलझा हुआ है, लेकिन हम आपको बताते हैं पश्चिम बंगाल की प्रसिद्ध मिठाई स्पंज रसगुल्ला यानी रसोगुल्ला की पूरी कहानी। हालांकि हरियाणा में भी रसगुल्ला बनाया और खाया जाता है, लेकिन बंगाली रसगुल्ला यानी स्पंज रसगुल्ला ने अपने खास पहचान बनाई है। खाने में मीठे के तौर पर स्पंज रसगुल्ला काफी पसंद किया जाता है।

1868 में हुई स्पंज रसगुल्ला की खोज

माना जाता है कि स्पंज रसगुल्ला यानी रसोगुल्ला की खोज साल 1868 में हुई। इसको ईजाद करने वाले थे नोबीन चंद्र दास। आज भी पश्चिम बंगाल में विशेषकर कोलकाता में केसी दास, बलराम मल्लिक एंड राधारमण मल्लिक और जुगल्स के रसगुल्लों की ब्रांडिंग साफ दिखेगी। हालांकि दावा किया जाता है कि इससे भी पहले 12वीं शताब्दी में ओडिशा में रसगुल्ले की उत्पत्ति हुई है। हालांकि ओडिशा में रसगुल्ला को खीर मोहना के नाम से जाना जाता रहा है।

भगवान जगन्नाथ का भोग

दरअसल ओडिशा में रसगुल्ला के शुरू होने के पीछे एक तर्क यह भी है कि उड़िया परंपरा बताती है कि रसगुल्ला पुरी स्थित भगवान जगन्नाथ का भोग है। साथ ही इसकी मान्यता भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा से भी जुड़ी हुई है। ऐसे में ओडिशा के लिए यह विशेष मिठाई बन जाती है। हालांकि पश्चिमी बंगाल में लोग दावा करते हैं कि रसगुल्ला को वहीं पर ईजाद किया गया है।

सामान्य रसगुल्ला और स्पंज रसगुल्ला में अंतर

सामान्यतौर दोनों ही रसगुल्ला की सामग्री और बनाने की विधि लगभग एक जैसी होती है। लेकिन इसके बावजूद इनमें काफी अंतर होता है। जैसे यदि स्पंजी रसगुल्ला को दबाया जाए तो वह दोबारा से अपने आकार में आ जाता है और चासनी को सोख लेता है। वहीं सामान्य रसगुल्ला दबाने पर चपटा हो जाएगा।

सामान्य रसगुल्ला की चासनी काफी गाड़ी होती है और यह सख्त होता है। वहीं स्पंज रसगुल्ला बहुत ही नर्म और जालीदार होता है। इसकी चासनी पतली होती है। दोनों को ही पनीर यानी छेना से बनाया जाता है। स्पंज रसगुल्ला मुख्य रूप से कम फैट वाले दूध का बनाया जाता है। अधिकतर गाय का दूध इसके लिए अधिक उपयोगी माना जाता है। क्योंकी इसमें फैट की मात्र कम रहती है।

पनीर से स्पंज बनाने की विधि ही इसको सामान्य रसगुल्ला से अलग करती है। क्योंकि स्पंज बनाने के लिए पनीर में मौजूद प्रोटीन मथने के दौरान एक विशेष जाली का रूप ले लेता है। यही स्पंज रसगुल्ले की जान होता है और सामान्य रसगुल्ले से इसको अलग करता है।

क्यों हुआ रसगुल्ला विवाद

आपको पता है इस बेहद मीठी और स्वादिष्ट मिठाई के लिए विवाद भी हो चुका है। क्योंकि 2017 में रसगुल्ला के लिए पश्चिम बंगाल को भौगोलिक संकेत (जीआई) टैग से सम्मानित किया। क्योंकि ऐसा माना जाता है कि इस मिठाई को अविष्कार यहीं हुआ है। इसके विरोध में ओडिशा के लोगों में काफी आक्रोश देखा गया। इतना ही नहीं ओडिशा में जीआई टैग के लिए अभियान भी चला। हालांकि इसके बाद 2019 में यह टैग ओडिशा को दे दिया गया।

अंतरराष्ट्रीय सफर पर रसगुल्ला

आज बंगाली रसगुल्ला पूरी दुनिया में विशेषकर जहां भारतीय समुदाय के लोग बसे हैं, वहां काफी प्रसिद्ध है। भारतीय त्योहारों के साथ-साथ सामान्य रूप से खाने के बाद मिठाई के रूप में भी इसको प्रयोग होता है। जिस प्रकार ओडिशा में धार्मिक कार्यक्रमों के दौरान इसका उपयोग हाता है, वैसे ही पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा जैसे बड़े आयोजनों और विवाह – शादियों में रसगुल्ला की खास मांग रहती है। विभिन्न ब्रांड आज विश्व भर में डिब्बाबंद और पैकेटबंद स्पंज रसगुल्लों की बिक्री कर रहे हैं। इससे यह मिठाई विश्व भर में पहुंच गई है।

मिठाई से अधिक परपंरा

हालांकि स्पंज रसगुल्ला एक बेहतरीन मिठाई तो है ही, साथ ही यह भारतीय पाक कला की पुरानी विरासत भी बन गया है। आज रसगुल्ला हर जगह अपनी छाप छोड़ रहा है। खाना और पाक कला निश्चित तौर पर राज्य और देश की सीमाओं को नहीं मान रहा है।

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