Forest fire : भयंकर ठंड में भी धधक रहे जंगल, नहीं रूक रही आग लगने की घटनाएं
उत्तराखंड में लगातार आ रहे जंगल में आग के मामले, असामाजिक तत्वों पर आग लगाने का आरोप
Forest fire : बेशक कड़ी ठंड और नमी भरे मौसम में आग जलाना मुश्किल हो रहा है, लेकिन उत्तराखंड के जंगलें में आग की घटनाएं थम नहीं रही हैं। अब ताजा मामला उत्तराखंड के बागेश्वर से आया है। यहां जंगल में आग लगने के बाद प्रशासन की टीम इस पर नियंत्रण पाने के लिए जुट गई है। वहीं जंगल में आग लगने के कारण जंगली जानवरों का भी बस्ती की ओर आने का खतरा रहता है। ऐसे में आग पर काबू पाने के साथ-साथ प्रशासन इन घटनाओं की जांच भी कर रहा है।
गौरतलब है कि जनवरी में भी महीने में कड़ाके की ठंड के बावजूद बागेश्वर और पिथौरागढ़ में आग की घटनाएं आई थी। जनवरी महीने के शुरूआत में कमस्यार घाटी में आग लगने का मामला अया था। इससे पहले नवंबर महीने में भी बागेश्वर के जंगल में आग लग गई थी। ऐसी ही घटना अब फिर से बागेश्वर के जंगलों में हुई है।
अराजक तत्वों पर आरोप
दरअसल इस बार बागेश्वर के जंगलों में जिला सचिवालय के सामने कुछ ऊपर को मंगलवार को आग की लपटें उठी। आरोप है कि अराजक तत्वों ने इस घटना को अंजाम दिया है। यह आग आरएफसी गोदाम से आगे घने जंगल व त्यूनरा से आगे जौलकांडे की ओर के लगी है। इसके कारण बड़े क्षेत्र में आग फैल गई है और वन संपत्ति को भारी नुकसान हो रहा है। इसके कारण यहां रहने वाले वन्य जानवरों पर भी असर पड़ रहा है। इसके अलावा गंभीर रूप से पर्यावरण प्रभावित हो रहा है।
लोगों ने दी प्रशासन को सूचना
दरअसल यहां आग लगने का पता सबसे पहले स्थानीय लोगों को चला। यहां से धुआं व आग की पलटें उठते देख ग्रामीणों ने जिला प्रशासन और वन विभाग के अधिकारियों को इसकी सूचना दी। यह सूचना पाकर प्रशासन बड़े प्रबंधों के साथ आग पर काबू पाने के लिए जुट गया। क्योंकि दिसंबर व नवंबर महीने में भी आग की घटनाएं हो चुकी हैं, ऐसे में प्रशासन इस बार काफी गंभीरता से जांच भी कर रहा है।
ग्रामीणों में दहशत
जंगल में आग लगाने के कारण आसपास रहने वाले ग्रामीण भी खौफ के साए में हैं। ग्रामीण वीरभान के अनुसार ऐसी स्थिति ग्रामीणों के लिए काफी खतरनाक होती है। क्योंकि जंगल में आग के कारण यहां रहने वाले वन्य जानवर आबादी की ओर आ जाते हैं। फसलों के साथ उनके घरों और मवेशियों का खतरा बढ़ जाता है। यहां तक कि लोगों की जान का भी जोखिम रहता है। ऐसे में आग की घटनाओं पर रोक लगे। वहीं ग्रामीणों का कहना है कि इस मौसम में आग की घटनाएं सामान्य नहीं हैं। गर्मियों के मौसम में आग लग जाती है, लेकिन अभी बहुत अधिक ठंडी व नमी है। इसके कारण आग खुद नहीं लग सकती।
लोगों द्वारा लगाई जा रही आग
वहीं इस प्रकार की घटनाओं के पीछे लोगों की गलती या योजना ही होती है। एक अधिकारी ने बताया कि
यहां पर परंपरागत घास लोगों के लिए बहुत उपयोगी है। इसके लिए पुरानी घास को हटा कर भूमिक को साफ करना होता है। इसके चलते कुछ लोग आग लगा देते हैं। इससे पुरानी घास पूरी तरह से जल जाती है। वहीं कई बार लोग यहां बीड़ी या अन्य चिंगरी भी फैंक देते हैं। इससे आग लग जाती है। उत्तरखंड के जंगलों में फायर लाइन भी नहीं बनाई जा रही है। क्योंकि पेड़ों के काटने पर रोक है।
रिहासशी क्षेत्रों पर भी असर
अब इस आग का असर रिहायशी क्षेत्रों पर भी पड़ने लगा है। क्योंकि आग फैलने के बाद इस पर काबू पाना आसान नहीं होता। ऐसे में जहां जंगली जीवों पर संकट हो रहा है, वहीं अब जंगल और यहां के लोगों के लिए भी यह आग खतरा बन रही है। हालांकि वन विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि यहां ईंधन, गर्मी और ऑक्सीजन का एक ऐसा योग बनता है, जिससे आग तेजी से फैलती है। क्योंकि चीड़ के पेड़ों की पत्तियां अधिक तेजी से जलती हैं।










