Straw Burning Rising Temperature : फसल अवशेष जलाने से तप रही धरती 4 साल में 0.57 डिग्री बढ़ा तापमान

काशी हिंदू विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञानियों ने किया शोध, पराली जलाने पर फिर तेज हुई चर्चा

Straw Burning Rising Temperature : कृषि अवशेष विशेषकर धान की पराली जलाने को लेकर हमेशा ही सरकारी एजेंसियां आमने-सामने रही हैं। अब तक जहां पराली जलाने से पर्यावरण वायु गुणवत्ता के स्तर पर नुकसान की बात हो रही थी, वहीं काशी हिंदू विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञानियों ने नया शोध जारी किया है। इसमें बताया गया है कि फसल अवशेष जलाने से धरती तप रही है। यह शोध वर्ष 2017 से 2021 के बीच उपग्रहों से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर किया गया है।

यह शोध सामने आने के बाद फिर से पर्यावरणवादियों ने इस बहस को तेज कर दिया है। हालांकि फसल अवशेष में अधिकतर धान की पराली जलाने के ही मामले आते हैं। जैसे-जैसे पराली प्रबंधन की तकनीक विकसित हुई है, इन मामलों में जबरदस्त कमी देखी है। क्योंकि किसान पहले से ही यह कह रहे हैं वे मजबूरी में धान के अवशेषों को जलाते हैं। इस बार धान के सीजन में पराली प्रति एकड़ 3 से 4 हजार रुपये तक बिकी है। ऐसे में किसानों ने पराली को नही जलाया।

धरती के तापमान को प्रभावित कर रही फसल अवशेषों की आग

शोधकर्ताओं ने कहा है कि पराली या अन्य अवशेषों को जलाने से केवल वायु गुणवत्ता ही प्रभावित नहीं हो रही है। बल्कि इससे क्षेत्रीय जलवायु के साथ-साथ धरती के तापमान पर भी सीधा प्रभाव पड़ रहा है। शोधकर्ताओं का दावा है कि पराली के जलने से जो ऊर्जा निकलती है और इससे निकलने वाले एरोसोल्स उत्तर-पश्चिम भारत में धरती की सतह का तापान बढ़ा रहे हैं। इसमें दिल्ली एनसीआर, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर शामिल हैं। इन राज्यों के भूतल का तापमान बढ़ा रहे हैं।

4 वर्षों का हुआ है अध्ययन

इस शोध में पर्यवारण विज्ञानियों ने 4 वर्षों का तुलनात्मक अध्ययन किया है। बीएचयू के पर्यावरण विज्ञानियों द्वारा वर्ष 2017 से 2021 के बीच के समय में उपग्रहों मिलने वाले आंकड़ा का विश्लेषण करते हुए यह शोध किया है। इसमें कहा गया है कि व्यापक स्तर पर आग वाले क्षेत्रों में धरती की सतह के तापमान में औसतन 0.57 डिग्री सेल्सियस का इजाफा हुआ है। क्योंकि आग से निकलने वाली ऊर्जा धरती की सतह के तापमान को प्रभावित कर रही है। इन आंकड़ों के विशलेषण के दौरान नवंबर माह में अक्टूबर की तुलना में आग की तीव्रता में 100 प्रतिशत तेजी पाई गई है। इसके अलावा पराली जलने पर जो धुआं निकलता है, उसके कण भी तापमान को बढ़ाने में सहायक मिले हैं।

हिमालय से सटे क्षेत्रों में प्रभाव कम

इस शोध में यह भी सामने आया है कि फसल अवशेष जलाने से बढ़े तापमान का असर हिमालय के सटे हुए क्षेत्रों में कम रहा है। क्योंकि यहां ठंड रहती है। इसके लिए शोधकर्ताओं ने रैंडम फारेस्ट नामक नान-लीनियर माडल का उपयोग किया गया है। इससे टीम ने इस विषय को समझा है कि तापमान को कौन सा कारक किस रूप में प्रभावित कर रहा है। इसके तहत पाया गया है कि आग की ऊर्जा पहले धरती की सतह के तापमान को बढ़ाती है। इसके बाद इससे निकलने वाले धुएं के कण और मौसम के अनुसार वायुमंडल की निचली परत में तापमान बढ़ाते हैं। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में सह प्राध्यापक डा. तीर्थांकर बनर्जी कहते हैं कि उत्तर-पश्चिम भारत के मध्य क्षेत्रों में आग की तीव्रता अधिक पाई गई है।

और भी गंभीरता से काम करने की जरूरत

इस शोध के बाद यह साफ हो गया है कि फसल अवशेष प्रबंधन के लिए सरकारों को और भी अधिक गंभीरता से काम करना होगा। ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि किसान खेत में अवशेषों को नहीं जलाए। इसके लिए बेहतर तकनीक विकसित की जा सकती है। हालांकि हरियाणा में कई जगह बायो गैस प्लांट लगे हैं, जहां पर पराली की खपत होती है, लेकिन अभी इनकी क्षमता काफी कम है।

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