Maruti Car : मारुति कार ने दिए भारतीयों के सपनों को पहिये, गुरुग्राम को मिली अंतरराष्ट्रीय पहचान

संघर्ष और आत्मविश्वास भरी 56 साल की यात्रा, आज भारतीयों के दिल पर करती है राज

Maruti Car : जब भी हम सड़कों पर कार देखते हैं इनमें अधिकतर गाड़ियां मारुति सुजुकी की दिखती हैं। मारुति सुजुकी भारतीयों के दिल व भारतीय सड़कों पर राज करती है। यह कहानी सिर्फ कार की नहीं, भारतीय मध्यम वर्ग के लोगों के सपनों को पहिए देने की है। मारुति की सफलता जितनी लंबी है, इसके संघर्ष इससे भी कहीं लंबे हैं। क्योंकि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम के रूप में काम शुरू करने वाली इस कंपनी को सरकारों का सहारा भी मिला और दुत्कार भी।

आइए आपको बताते हैं मारुति के शुरू होने से लेकर संघर्ष और सफलता तक की कहनी है। इसको चलाने के लिए तब के वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों को भी पसीना बहाना पड़ा। सिर्फ गाड़ियों के क्षेत्र में नहीं, देश में उद्योगों के क्षेत्र में भी इस कंपनी ने नई इबारत लिखी। इसकी शुरूआत हुई 1970 में। हालांकि यह शुरूआत तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरागांधी के छोटे बेटे संजय गांधी के सपनों से शुरू हुई, और देखते ही देखते इसने न सिर्फ मूर्त रूप लिया, युवाओं को रोजगार के क्षेत्र में भी नई शुरूआत की।

आंदोलन और विरोध

मारूति की राह इतनी आसानी नहीं थी। केंद्र में कांग्रेस की सरकार हटने के बाद कई प्रकार के आरोप लगे। 1977 में बनी जनता पार्टी की सरकार के समय में परियोजना का काम बंद हो गया। इसकी जांच के लिए शाह आयोग का गठन भी किया गया। इंदिरा गांधी दोबारा प्रधानमंत्री बनी तो उन्होंने अपने बेटे संजय गांधी के इस ड्रीम प्रोजेक्ट को दोबारा शुरू करवाया। हालांकि आज गाड़ियों की मांग को देखते हुए मारुति ने गुरुग्राम के साथ मानेसर और खरखौदा में भी बड़े-बड़े प्लांट लगा लिए हैं।

सपने से शुरू होकर हकीकत तक पहुंची मारुति

मारुति को देश में शुरू करना आसान नहीं था। क्योंकि सरकारी पूंजी के साथ निजी निवेश की भारी कमी थी, लेकिन इस परियोजना को सरकार ने अपने हाथ में लिया। परियोजना की जटिलता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसको शुरू होने में 10 साल का समय लग गया। क्योंकि इसकी शुरूआत सरकारी क्षेत्र के उपक्रम के रूप में हुई, ऐसे में राजनीतिक बाधाएं भी काफी अधिक रही। मारुति मैन के नाम से प्रसिद्ध हुए और 1956 बैच के आईएएस आरसी भार्गव ने इसको लेकर द मारुति स्टोरी नाम पुस्तक लिखी है। वे भारतीय प्रशासनिक सेवा को छोड़ कर मारुति सुजुकी इंडिया के चेयरमैन बने। उनकी किताब में इस संघर्ष को दर्शाया गया है। उन्होंने बताया है कि कैसे वी कृष्णमूर्ति के साथ मिल कर किस प्रकार राजनीतिक हस्तक्षेप को कम किया। उन्होंने यहां तक कहा कि मारुति की कहानी केवल एक कार बनाने की नहीं है, बल्कि एक आधुनिक भारत के निर्माण की कहानी है।

पहला विकल्प नहीं बनी सुजुकी

देश में जनता की कार बनाने का सपना देखा थ प्रधानमंत्री के बेटे ने। ऐसे में सरकार भी इसमें गंभीरता से काम कर रही थी। हालांकि मारुति के पास इस कार को लेकर साफ विजन तो तैयार था, लेकिन कमी थी तकनीक की। इसके लिए उस दौर में विश्व भर में दिग्गज रहीं कपंनियों के साथ हाथ मिलने का प्रयास किया, लेकिन सफलता नहीं मिली। यहां तक की कुछ कंपनियों की टॉप मैनेजमेंट भारतीय प्रतिनिधि मंडल से मिलने को भी तैयार नहीं थी। ऐसे में जापान की सुजुकी मोटर कॉर्पोरेशन के साथ यह समझौता हुआ। इसके बाद 1982 में भारत सरकार और सुजुकी के बीच औपचारिक रूप से समझौता होने के बाद यह मारुति -सुजुकी बन गई। शुरूआत में मारुति में सुजुकी की हिस्सेदारी सिर्फ 26 प्रतिशत थी।

हरियाणा में लपकी संभावना

यह मामला राजनीतिक के साथ-साथ विकास का भी था। इस प्लांट के लिए हरियाणा सरकार ने गुरुग्राम में जमीन उपलब्ध करवाई। इससे हरियाणा का औद्योगिक विकास शुरू हुआ। आज गुरुग्राम में कार निर्माण का बहुत बड़ा केंद्र बन गया है। इस प्लांट में सिर्फ कारों का निर्माण नहीं होना था। भारतीय अधिकारियों ने देख लिया था कि जापान में लोगों के काम करने की संस्कृति काफी अलग है। वहीं भारत में कर्मचारियों को समय पर आने में कोई रूचि नहीं थी।

ऐसे में यहां जापानी संस्कृति के आधार पर काम शुरू हुआ और मारूति सफल उद्योग बन गई। पहली बार दिसंबर 1983 में भारत की पहली किफायती कार का निर्माण हुआ। जिसका नाम था मारुति 800। इसका महत्व इसी बात से लगाया जा सकता है कि पहले कार खरीदार हारपाल सिंह को तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने चाबी सौंपी थी।

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