Same Gotra Marriage Cause Of Thalassemia: एक ही गोत्र में शादियां करने से होता है थैलेसीमिया का खतरा, आनुवंशिक बीमारियों से बचाव के लिए बड़ा वैज्ञानिक आधार

हरियाणा की खाप पंचायतें भी करती रही हैं एक ही गोत्र में शादी का विरोध, विज्ञान भी मान चुका है एक ही गोत्र में शादियों से अनुवंशिक बीमारियों की बात। थैलेसीमिया जैसी गंभीर बीमारी से बचाव व जागरूकता के लिए हर साल 8 मई को थैलेसीमिया दिवस मनाया जाता है

रोहतक : Same Gotra Marriage Cause Of Thalassemia हरियाणा जैसे क्षेत्र में एक ही गोत्र में शादियां बड़ा विषय रहा है। हरियाणा की खाप पंचायतें एक ही गोत्र में शादियों को परंपराओं के विपरीत बताती हैं, लेकिन इसका वैज्ञानिक आधार भी है कि एक ही गोत्र में शादियां होने से अनुवंशिक बीमारियां आती हैं। विशेषकर थैलेसीमिया जैसी बीमारी इसका कारण बन सकती है। जिसमें मरीज को खून की कमी रहती है। आइए आपको समगोत्र शादियों विषय में विस्तृत जानकारी उपलब्ध करवाते हैं।

विज्ञान भी करता है कि शादी के दौरान कुंडली से पहले रक्त मिलान होना चाहिए। क्योंकि रक्त ही यह तय करता है कि किस प्रकार की अनुवंशिक पीढ़ी चलेगी। इसमें यदि लड़का और लड़की एक ही गोत्र के हैं तो उनका रक्त भी एक ही जैसा होगा। इऐसे में दोनों में थैलेसीमिया के वाहक मिलने का खतरा अधिक रहता है। यही कारण है कि एक ही गोत्र में शादियां नहीं करनी चाहिएं।

क्या होता है थैलेसीमिया बीमारी

दरअसल थैलेसीमिया एक बहुत ही गंभीर बीमारी होती है। इस बीमारी ग्रस्त व्यक्ति में 15 से 20 दिन में ही रक्त की लाल कोशिकाएं अपने आप समाप्त हो जाती हैं। इसके साथ ही खून में आयरन की मात्रा बढ़ती है। ऐसे में इससे पीड़ित लोगों को नियमित रूप से एक से दो महीने में खून चढ़ाने की जरूरत होती है। साथ ही शरीर में आयरन का स्तर संतुलित रखने के लिए दवा भी लेनी पड़ती है। इस बीमारी ग्रस्त लोगों के लिए विभिन्न योजनाएं भी चलाई जाती हैं।

यह होती है थैलेसीमिया की पहचान

थैलेसीमिया से ग्रस्त लोगों को बचपन से ही पहचाना जा सकता है। क्योंकि इनमें लक्षण दिखने लगते हैं। इसके तहत इस बीमारी से ग्रस्त बच्चों की जीभ पीली रहेगी और नाखून भी पीले या सफेद दिखेंगे। बच्चों को विकास रूक जाता है। इसके अलावा जबड़ा और गाल पर सूजन रहेगी। इससे यह असामान्य दिखेंगे। कई बार बच्चों को सांस लेने में भी दिक्कत हो सकती है।

समय पर सही इलाज जरूरी

जींद नागरिक अस्पताल के पूर्व चिकित्सक डा. रमेश कुमार कहते हैं कि थैलेसीमिया से ग्रस्त माता-पिता से होने वाली संतान को भी इससे बचाया जा सकता है। इसकी 50 प्रतिशत संभावना रहती है। इसके लिए सबसे पहले समय से जांच करवाएं। यह जांच गर्भावस्था में होती है। जांच में यह पता लग सकता है कि बच्चा थैैलेसीमिया से कितना प्रभावित है। यदि प्रभाव कम है तो इसका इलाज संभव है।

क्या है वैज्ञानिक आधार

समगोत्र शादियों को लेकर शोध भी हुए हैं। CSIR-IGIB का अध्ययन बताता है कि भारत में कई ऐसी जातियां हैं, जिनमें अपने ही समुदाय में शादियां होती हैं। इनमें विशेष जेनेटिक विकार मिले हैं। इसी के आधार खाप पंचायतें भी यह कहती हैं कि एक ही गोत्र में शादियों पर रोक लगाई जानी चाहिए। प्राचीन भारतीय स्वास्थ्य प्रणाली यानी आयुर्वेद में भी बीज शुद्धि यानी अलग गोत्र में शादियों पर बल दिया गया है।

लंबे समय चल रही है मांग

हरियाणा के जींद स्थित माजरा खाप के प्रवक्ता समुंद्र फोर का कहना है कि खाप पंचायतें लंबे समय से समगोत्र विवाह नहीं होने देने की मांग कर रही हैं। यह सही है कि समगोत्र विवाह हमारी परंपरा के विरुद्ध है, लेकिन इसके साथ ही इसका वैज्ञानिक पहलू भी है।

यह सच्च है कि एक गोत्र में शादी होने से बच्चे कमजाेर पैदा होते हैं। इसके लिए जरूरी है कि हिंदू विवाह अधिनियम में बदलाव हो। ताकि एक ही गोत्र में शादियों पर पूरी तरह से रोक लग सके। फोर करते हैं कि हिंदू विवाह अधिनियम में भी सपिंड विवाह वर्जित है। इसमें पिता की ओर से 5 पीढ़ी और माता की ओर से 3 पीढ़ी की व्यवस्था है। इसको और अधिक बेहतर किया किया जाना चाहिए।

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