Cotton Import Duty : टेक्सटाइल उद्योग पर बोझ बना आयात शुल्क, तमिलनाडू के मुख्यमंत्री ने केंद्र को लिखा पत्र
आयात शुल्क घटाने की मांग, कहा दबाव में है टेक्सटाइल उद्योग, 2 महीने में 1000 रुपये प्रति कैंडी का आया है उछाल
टेक्सटाइल उद्योग पर संकट
केंद्र सरकार को लिखे पत्र में तमिलनाडू के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने कहा है कि कपास और सूत की कीमतों में जिस प्रकार वृद्धि हुई है,इससे टेक्सटाइल उद्योग काफी दबाव में है। ऐसे में जल्द ही इस उद्योग को राहत देने की जरूरत है। मुख्यमंत्री ने अपने पत्र में यह भी कह दिया है कि ऐसा नहीं होने पर भारत का टेक्सटाइल और इसके साथ ही गारमेंट उद्योग संकट में आने का खतरा है।
हरियाणा व राजस्थान की प्रमुख नकदी फसल होती थी कपास
कपास के उत्पादन की बात की जाए तो इसमें काफी गिरावट आई है। हरियाणा व पंजाब में पिछले एक दशक के मुकाबले कपास का क्षेत्रफल 50 प्रति से भी अधिक कम हुआ है। हरियाणा में सिरसा, हिसार, भिवानी, फतेहाबाद जैसे जिल कपास की पैदावार के लिए काफी चर्चित रहे हैं। हरियाणा में कभी कपास का क्षेत्रफल 8 लाख एकड़ तक होता था। यह अब 4 लाख तक आ गया है। राजस्थान में भी कपास का उत्पादन इसी तुलना में कम हुआ है। (Cotton news)
कीमतों में आया है भारी उछाल
गौरतलब है कि मांग बढ़ने के कारण पिछले 2 महीने में कपास की कीमतों में काफी उछाल आया है। स्वयं मुख्यमंत्री विजय ने भी इसको लेकर केंद्र सरकार को लिखे पत्र में बात की है। उन्होंने कहा है कि दो महीनों में कपास का भाव 1000 रुपये से अधिक बढ़ा है।
पहले प्रति कैंडी कपास 54,700 में आती थी। अब यह 67,700 रुपये में मिल रही है। ऐसे में यह उछाल करीब 25 प्रतिशत तक हुआ है। साथ ही तैयार भी सूत की कीमत भी बढ़ी हैं। पहले प्रति किलोग्राम सूत 301 रुपये था अब यह 330 प्रति किलो तक पहुंच गया है। ऐसे में गारमेंट्स उद्योग काफी दबाव में है।
कैंडी में होता है कपास का कारोबार
कपास को अंतरराष्ट्रीय मार्केट में कैंडी में ही मापा जाता है। 1 कैंडी में 356 किलोग्राम कपास होती है। यानी 3.56 क्विंटल। हालांकि स्थानीय मार्केट में कपास का भाव क्विंटल के हिसाब से ही तय होता है। अब कपास का उत्पादन कम होने से इसका आयात बढ़ा है। ऐसे में स्थानीय टेक्सटाइल उद्योग को नुकसान हो रहा है।
देश में घटा है उत्पादन
दरअसल पिछले कुछ समय में देश में कपास का उत्पादन घटा है। दक्षिणी भारत मिल संघ की मानें तो उत्पादन खफत से अधिक होने के कारण ही 11 प्रतिशत आयात शुल्क लगाया था। क्योंकि तब देश में कपास का उत्पादन 353 लाख गांठ का था। इसके मुकाबले खपत सिर्फ 320 लाख गांठ की ही रही। वहीं अब कपास का उत्पादन घट कर 291 लाख गांठ तक सिकुड़ गया है। वहीं मांग में वृद्धि आई है और यह 328 लाख गांठ की हो गई है।










