Monsoon prediction : टिटहरी के अंडों का मानसूनी कनेक्शन, पक्षियों का विज्ञान या परंपरा
क्या होता है जब टिटहरी बहुत ऊंचाई पर अंडे देती है टिटहरी
Monsoon prediction : आज विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है कि बारिश के दिन की तो छोड़ो घंटों का भी सही अनुमान वैज्ञानिक लगा लेते हैं। लेकिन जरा सोचिए जब विज्ञान इतना विकसित नहीं था तब हमारे बुजुर्ग कैसे अनुमान लगाते थे कि इस बार मानसून में बारिश कैसी होगी।
उनके पास आज की तरह आधुनिक राडार और उपग्रह तो नहीं थे, लेकिन कुछ ऐसे फैक्टर जरूरत थे, जिनसे वे अनुमान लगा लेते थे। आज भी उनकी सटीकता पर कोई शक नहीं है। यह प्राकृतिक वर्षा अनुमान देने वाला यंत्र था टिटहरी। हमारे बुजुर्ग टिटहरी के अंडों की जगह देख कर यह अनुमान लगा लेते थे कि मानसून में बारिश कैसी होगी।
कैसा होता है यह पक्षी
टिटहरी पक्षी बहुत ही फुर्तीला और चमकदार होता है। इसका रंग हल्का भूरे और सफेद होता है। टिटहरी की आंखों के आगे और चोंच पर एक विशेष प्रकार की लाल पट्टी रहती है। यह पक्षी मानसून शुरू होने से ठीक पहले यानी मई महीने में अंडे देती है। इन अंडों का स्थान ही यह बताने के लिए काफी रहता है कि इस बार मानसून में बारिश कैसी रहने वाली है।
चार अंडों से कैसे तय होता है मानसून
दरअसल सामान्यतौर पर टिटहरी मानूसन से ठीक पहले और 4 अंडे देती है। बुजुर्गों का मानना है कि यह बारिश का मौसम यानी चौमासा के प्रतीक हैं। हालांकि आज के दौर में लोग इसको अंधविश्वास भी मानते हैं, लेकिन रोहतक के सेक्टर 1 निवासी 80 वर्षीय देवीदत्त के अनुसार यह अंधविश्वास नहीं है। यह पूर्वजों के अनुभवों के आधार पर किया गया शोध है और इसके परिणाम सबके सामने हैं। अनुमान तो मौसम विभाग के भी विफल हो जाते हैं और टिटहरी के भी। लेकिन हम वर्षों से इसमें सटीकता देखते आए हैं।
अंडे ऊंचाई तो भारी बारिश की स्थिति
देवीदत्त बताते हैं कि उनके जीवन में कई बार ऐसा हुआ है कि टिटहरी के अंडे किसी ऊंची जगह पर मिलते हैं। उस साल बारिश अधिक होती है। यानी टिटहरी भांप लेती है कि इस बार बारिश अधिक होगी ओर उसके अंडे सुरक्षित रखने चाहिंए। बहुत बार ऐसा भी होता है कि टिटहरी के अंडे खेत में सीधे जमीन पर मिलते हैं। इससे अनुमान हो जाता है कि बारिश कम है। किसान ऐसी स्थिति में खेत की जुताई करते हुए जहां अंडे मिलते हैं, उस जगह को छोड़ देता है। ताकि अंडों को क्षति नहीं पहुंचे।
सिर्फ स्थान नहीं स्थिति भी बताती है कुछ संदेश
रोहतक के भालोठ गांव निवासी प्रेम सिंह के अनुसार ऊंचे या नीचे स्थान पर टिटहरी के अंडे से सिर्फ बारिश की मात्रा का अनुमान होता है। यह विज्ञान इससे भी आगे है। ध्यान से देखना चाहिए कि क्या अंडों का पतला या नुकीला हिस्सा जमीन की ओर या तिरछा। क्योंकि यह सीधा होने का अर्थ कि बहुत तेज बारिश होने वाली है। टेडा होने पर माना जाता है यह हवा की स्थिति का प्रतीक है।
सिर्फ अनुमान या पक्षियों का बैरोमीटर
हालांकि कई शोधों में यह साफ हो चुका है कि पक्षियों को मौसम में होने वाले बदलावों की जानकारी पहले महसूस हो जाती है। क्योंकि पक्षियों के कान में ऐसी तकनीक होती है, जो इसमें मदद करती है। पैराटिम्पैनिक नामक विशेष अंग मौसम संबंधित बदलावों को डिटेक्ट करता है। इसके लिए वायुमंडलीय दबाव में होने वाले बदलावों को महसूस कर लेते हैं।
यह है वैज्ञानिक प्रमाण
बेशक कुछ लोग आज भी इसको अंधविश्वास मानते रहें, लेकिन वैज्ञानिक प्रमाण भी हैं कि भारत में 2004 की सुनामी से काफी पहले ही पक्षियों तटीय क्षेत्रों को छोड़ दिया था। इसके पीछे का विज्ञान है इन्फ्रासाउंड। यह बहुत ही कम आवृत्ति वाली ध्वनियां होती हैं, जिनको पक्षी महसूस कर लेते हैं। इसको लेकर अमेरिका में भी शोध प्रकाशित हो चुका है कि गोल्डन-विंग्ड वॉरबलर्स पक्षी बवंडर से करीब 24 घंटे पहले उस स्थान से दूर चले गए थे।










