Haryana news : हरियाणा के इन गांवों में बदली परंपरा, सामूहिक भोजन, भंडारों में डिस्पोजल कल्चर छोड़ स्टील की थालियों का प्रयोग
हरियाणा डायरी, रेवाड़ी।
Haryana news : हरियाणा में इन दिनों डिस्पोजल कल्चर का चलन बहुत ज्यादा हो गया है। किसी तरह का धार्मिक आयोजन हो या फिर भंडारा या वैवाहित और दूसरा भोज कार्यक्रम हो, थर्मोकोल के डिस्पोजल प्लेट, कप का प्रयोग किया जाता है। यह यूज एंड थ्रो होती हैं लेकिन पर्यावरण के लिए बहुत खतरनाक होती हैं, क्योंकि ये पूरी तरह से नष्ट नहीं होती।
रेवाड़ी जिले के कई गांव अब इस परंपरा को बलते हुए सामूहिक कार्यक्रमों, भंडारों और धार्मिक आयोजनों में प्लास्टिक और थर्माकोल की डिस्पोजेबल थालियों की जगह स्टील के बर्तनों का उपयोग करने लगे हैं। इस बदलाव को ग्रामीणों ने न केवल पर्यावरण संरक्षण से जोड़ा है, बल्कि इसे सामाजिक जिम्मेदारी और स्वास्थ्य सुरक्षा की दिशा में भी बड़ा कदम माना जा रहा है।
बता दें कि रेवाड़ी के दखोरा, कृष्णगढ़ और सुरहेली जैसे गांवों में मंदिर समितियों और ग्रामीणों ने मिलकर यह निर्णय लिया है कि अब धार्मिक आयोजनों में प्लास्टिक का उपयोग नहीं किया जाएगा। इसके लिए गांव स्तर पर स्टील की थालियां, गिलास और अन्य बर्तन खरीदे गए हैं, जिन्हें सामूहिक कार्यक्रमों में इस्तेमाल किया जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि इससे कचरे की समस्या कम हुई है और आयोजन स्थल भी पहले की तुलना में अधिक साफ-सुथरे दिखाई देते हैं।

Haryana news : बड़ी मात्रा में प्रयोग हो रहे डिस्पोजल
ग्रामीणों सुनील, धर्मवीर, राकेश, प्रदीप, जोगेंद्र, कुलदीप के अनुसार कुछ वर्ष पहले तक मंदिरों और सामाजिक आयोजनों में बड़ी मात्रा में डिस्पोजेबल प्लेटें इस्तेमाल होती थीं। कार्यक्रम खत्म होने के बाद गांवों में प्लास्टिक और थर्माकोल का कचरा फैला रहता था, जिसे नष्ट करना भी मुश्किल होता था। इसके कारण पर्यावरण प्रदूषण बढ़ने के साथ-साथ पशुओं और लोगों के स्वास्थ्य पर भी असर पड़ रहा था।
इसी समस्या को देखते हुए गांवों ने सामूहिक रूप से स्थायी समाधान अपनाने का निर्णय लिया। मंदिर समितियों का कहना है कि शुरुआत में लोगों को इस व्यवस्था के प्रति जागरूक करना चुनौतीपूर्ण था, लेकिन अब ग्रामीण स्वयं इसे अपनाने के लिए आगे आ रहे हैं। कई जगह युवाओं और महिलाओं ने इस अभियान में सक्रिय भूमिका निभाई है। कार्यक्रम समाप्त होने के बाद बर्तनों की सफाई और रखरखाव के लिए भी सामूहिक व्यवस्था बनाई गई है।
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विशेषज्ञों का मानना है कि गर्म भोजन को प्लास्टिक और थर्माकोल के बर्तनों में परोसने से स्वास्थ्य संबंधी जोखिम बढ़ सकते हैं। ऐसे में स्टील के बर्तनों का उपयोग सुरक्षित और टिकाऊ विकल्प माना जा रहा है। साथ ही इससे बार-बार डिस्पोजेबल सामग्री खरीदने की जरूरत भी कम होती है, जिससे आर्थिक बचत भी हो रही है।
ग्रामीण क्षेत्रों में शुरू हुई यह पहल अब दूसरे गांवों के लिए भी प्रेरणा बनती जा रही है। सामाजिक संगठनों का कहना है कि यदि इसी तरह सामूहिक आयोजनों में प्लास्टिक मुक्त व्यवस्था को बढ़ावा दिया जाए तो पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ा बदलाव संभव है।










