Papaya containing chemicals : सावधान! क्या आप भी कैमिकल से पका पपीता खा रहे हैं, जानें कैसे करें पहचन

पीपीता बहुत ही स्वास्थ्यवर्धक फल होता है। विशेषकर पेट संबंधित समस्याओं के चलते चिकित्सक भी पपीता खाने की सलाह देते हैं, लेकिन बाजार में कई बार हमें कैमिकल से पका हुआ पपीता मिल जाता है। यह शरीर में फायदा करने की बजाय उल्टा नुकसान करता है। तो जान लें कैमिकल से पके हुए पपीते की क्या पहचान है।मिलावटी वस्तुओं को लेकर अपने अनुभव जरूर सांझा करें। साथ ही यह जानकारी अपने जानकारों के साथ भी शेयर करें, ताकि वे इस जहर से बच सकें।

Papaya containing chemicals  : सोचिए आप अपने अच्छे स्वास्थ्य के लिए प्रतिदिन फल खाते हैं। लेकिन यह फल यदि कैमिकल से पके हुए हों तो इनका शरीर पर नाकारात्मक प्रभाव पड़ना यह है।

आजकल सभी प्रकार के फलों को कैमिकल से पकाया जाता है। इससे फल में हानिकारक तत्व भी आ जाते हैं, जो फल के साथ शरीर में जाकर लाभ देने की बजाय नुकसान ही करते हैं। आज आपको बताते है कैमिकल से पके हुए पपीते की पहचान।

कैल्शियम कार्बाइड जैसे खतरनाक रसायन का प्रयोग

दरअसल पपीते को पकाने के लिए कुछ लोग कैल्शियम कार्बाइड जैसे इतने खतरनाक रसायन का प्रयोग करते हैं, जो शरीर में कई विकारों का कारण बन सकता है। मुनाफाखोरी के चक्कर में लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ किया जाता है। हालांकि कैमिकल से पके हुए पपीते देखने में बहुत ही आकर्षक होते हैं, लेकिन इनके खाने से शरीर में धीमा जहर जाता है। ऐसे में परिणाम होता है पेट खराब और कई प्रकार की गंभीर बीमारियां

क्या पपीते का रंग प्राकृतिक है

दरअसल भारत में सबसे अधिक पपीते का उत्पादन आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, पश्चिमी मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में होता है। यहां से देश भर में पपीता सप्लाई किया जाता है। इसके लिए अधिकतर सड़क मार्ग का ही प्रयोग होता है। ऐसे में पपीता बाग से आप तक पहुंचने में करीब 10 दिन का समय लगता है। इसलिए यह देख लें कि जो पपीता आप खरीद रहे हैं, उसका रंग प्राकृतिक है या नहीं।

प्राकृतिक तरीके पकने वाले पपीते के एक फल में ही रंग भिन्न होता है। क्योंकि पपीते का फल नीचले भाग से पकना या पीला होना शुरू होता है। ऐसे में यह फल के डंठल की ओर हरा रह जाता है। यह डंठल की ओर से देखने में हरे और पीले रंग मिश्रण दिखेगा। ऐसा पपीता आप खा सकते हैं।

वहीं कैमिकल से पकाने पर पपीता पूरी तरह से पीला और तैयार दिखता है। रंग में अजीब सी चमक भी होती है।
हां इसके बीच में कहीं-कहीं हरे चकते रह जाते हैं। इसको कभी प्रयोग नहीं करें।

मुलायम होना चाहिए फल

प्राकृतिक तरीके से पका हुआ पपीते का फल नेचुरल रूप से मुलायम महसूस होगा। क्योंकि यह धीरे-धीरे पकता है। इसको छूने से भी यह दबाव महसूस करता है। इससे साफ होता है कि पपीता प्राकृतिक रूप से पका हुआ है। यदि इसका उल्टा होता है तो पपीता सिर्फ बाहरी अवसर पका हुआ दिखेगा। दबाने से यह ठोस महसूस होगा। क्योंकि यह बाहर से तो कैमिकल के प्रभाव के कारण पीला हो गया है, लेकिन पका नहीं है।

मनमोहक खुशबू भी सबसे बड़ी पहचान

प्राकृतिक रूप से जब कोई भी फल पकता है तो इसमें नेचुरल खुशबू आती है। इसको डंठल की ओर से महसूस किया जा सकता है। यह खुशबू बता देती है कि फल पका हुआ है। वहीं कैमिकल से पकने पर पपीते से इस प्रकार की प्राकृतिक खुशबू नहीं आएगी।

हां इसमें कैमिकल की महक जरूर आएगी। तो समझ जाएं कि यह पपीता आपके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। इसके अलावा पपीते के छिलके की बनावट भी बड़ी पहचान है। यदि फल पर हल्के भूरे या काले रंग के छोटे-छोटे प्राकृतिक दाग दिखते हैं तो यह सामान्य है। यदि पपीता बहुत ही अधिक साफ और चमकीता है तो इसमें जरूर गड़बड़ हो सकती है।

काट कर देख लें

हरियाणा के जींद में तैनात जिला खाद्य सुरक्षा अधिकारी डा. योगेश कादयान के अनुसार सबसे आसान है पपीते को काट कर देखा जा सकता है कि क्या इसमें कैमिकल का प्रयोग हुआ है। क्योंकि काटने पर पपीता अंदर से पूरी तरह हल्का लाल दिखेगा। यह खाने में भी मीठा होगा। साथ ही बीज भी गहरे काले मिलेंगी। जबकि कैमिकल से पके हुए पपीते में कहीं कहीं सफेद भाग दिखेंगे, जो कच्चे होंगे। स्वाद में मिठास नहीं होगी।

नियमित रूप से की जाती है जांच

जिला खाद्य सुरक्षा अधिकारी डा. योगेश कादयान के अनुसार जींद में नियमित रूप से जांच कर यह सुनिश्चित किया जाता है कि हानिकारक कैमिकल से फल नहीं पकाए जाएं। हां गैस से फल पकाए जाते हैं, जो नियमानुसार होता है। लोगों को जागरूक होना चाहिए। यदि ऐसा कहीं दिखता है, या किसी भी मिलावटी सामग्री की जानकारी मिलती है तो जरूर जिला प्रशासन या खाद्य सुरक्षा की टीम को सूचित करें। ऐसे लोगों को पर कार्रवाई की जाएगी।

अच्छी तरह से धो कर ही खाएं फल

कैथल के वरिष्ठ चिकित्सक डा. पंकज कुमार के अनुसार पपीता ही नहीं आजकल किसी भी फल पर भरोसा करना मुश्किल है। ऐसे में सबसे बेहतर है कि फलों को अच्छी प्रकार से धो लें। इसके लिए जरूरी है कि कम से कम 15-20 मिनट फल को पानी में डुबोकर रखें। इसके बाद फिर से साफ पानी में धो लें। इससे रसायन का प्रभाव काफी कम हो जाता है। विशेषकर जिन फलों को सीधा खाया जाता है, जैसे अंगूल, आड़ू , आलुबुखारा में यह प्रक्रिया 2 बार करनी चाहिए।

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