Haryana : हाई कोर्ट का अहम फैसला, बस की छत पर सफर बना मौत का कारण तो भी मिलेगा बीमा मुआवजा
हरियाणा डायरी, चंडीगढ़।
Haryana News : पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने एक बड़ा और अहम फैसला सुनाते हुए उन परिवारों को राहत दी है, जिनके परिजन बस में सफर के दौरान हादसे के शिकार हो गए थे। हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि अगर बस की छत पर सफर के दौरान कोई हादसा हो जाता है तो वह बीमा सुरक्षा के दायरे से बाहर नहीं माना जाएगा।
हाई कोर्ट ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें मृतक के परिवार को मुआवजा देने के आदेश दिए गए थे। दरअसल मामला साल 2009 से जुड़ा है। मिली जानकारी के मुताबिक प्रमोद कुमार नामक युवक राजस्थान रोडवेज की बस में सफर कर रहा था। बस में अधिक भीड़ होने के कारण वह बस की छत पर बैठ गया। सफर के दौरान बस चालक ने अचानक ब्रेक लगाए, जिससे प्रमोद नीचे गिर गया और उसकी मौके पर ही मौत हो गई थी।
Haryana news : बस की छत से गिरने के बाद लगाई थी परिजनों ने याचिका
प्रमोद की मौत के बाद उसके परिजनों ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण में मुआवजे के लिए याचिका दायर की थी। अधिकरण ने मामले की सुनवाई के बाद परिवार के पक्ष में फैसला सुनाते हुए मुआवजा देने का आदेश दिया था। इसके बाद बीमा कंपनी ने अधिकरण के आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी। कंपनी की ओर से तर्क दिया गया कि मृतक बस की छत पर बैठा था, जो नियमों के खिलाफ है। ऐसे में उसे बीमा सुरक्षा का लाभ नहीं मिलना चाहिए।
Haryana news : हाई कोर्ट ने स्वीकार नहीं की दलील
हाई कोर्ट ने बीमा कंपनी की दलील को वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि यदि बस में यात्रियों की संख्या अधिक थी और चालक-परिचालक ने यात्री को छत पर बैठने दिया, तो इसकी जिम्मेदारी केवल यात्री पर नहीं डाली जा सकती। इसके लिए चालक-परिचालक भी जिम्मेदार हैं। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सार्वजनिक परिवहन में यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना चालक और परिचालक की जिम्मेदारी है।
यदि किसी यात्री को बस की छत पर बैठाकर यात्रा करवाई जाती है, तो यह परिवहन प्रबंधन की लापरवाही मानी जाएगी। अदालत ने यह भी माना कि हादसे का मुख्य कारण चालक द्वारा अचानक ब्रेक लगाना था। ऐसे में मृतक को बीमा दावे से वंचित नहीं किया जा सकता।
हाई कोर्ट का यह फैसला सड़क सुरक्षा और यात्री अधिकारों के लिहाज से अहम माना जा रहा है। इससे स्पष्ट संदेश गया है कि दुर्घटना के मामलों में केवल तकनीकी आधार पर पीड़ित परिवारों को राहत से वंचित नहीं किया जा सकता।










